समय बीतने पर शब्दों का भी अपभ्रंश हो जाता है और शब्दों के अर्थ भी बदल जाते हैं जैसे – “लोहरी” ही “लोहड़ी” के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
लोहरी का तात्पर्य,अर्थ है – “लो+हरी” अर्थात् हरी को स्वयं को देना या समर्पित हो जाना।
हे हरी ! हमने स्वयं को तुम्हें समर्पित कर दिया है अब तुम ही हमें संभालो हमारे सारे अहंं अर्थात् मैं-भाव एवं भेद-भाव तथा परार्थ-स्वार्थ,कुविचार-सुविचार सभी हर लो या हरण कर लो।
हे हरी ! अब तो हमने स्वयं को पूर्ण रूपेण आपके श्रीचरणों में समर्पित कर दिया है।
अब हम विलीन हो गये।अब आप ही करण-कारण हैं। “लोहरी” का त्योहार सूर्य-उतरायण के आगमन के पूर्व स्वयं के अस्तित्व के प्रति हमारे समर्पण का अवसर है।
“लोहरी” पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
।। सबका मंगल हो ।।

आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”



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